B M VYAS

सिनेमा का लगभग हर दर्शक, आपको ऐसे किसी न किसी सिनेमाई दृश्य के बारे में बता सकता है, जो देखने के सालों बाद भी उनके ज़हन में ताज़ा हैं। वह उस फिल्म को, उन कलाकारों को, उन संवादों को चाहे भूल जाए पर उन दृश्यों का प्रभाव हमेशा याद रहता है। मेरे लिए ऐसा एक दृश्य वह था जिसमें दुविधा में फंसे दशानन रावण, सीता-हरण के बाद क्या करना हैं ये तय करने की कोशिश में अपने बाकी के ९ सिरों से बातचीत कर रहे हैं, उनका हर सर किसी सकारात्मक या नत्कारात्मक भाव के अनुसार उनका मार्गदर्शन करता है। यह एक ऐसा अविस्मर्णीय दृश्य था जो मेरे मन पर चिरस्थायी प्रभाव छोड़ गया। सालों बाद मुझे इस फिल्म के बारे में कुछ याद नहीं था, अगर कुछ याद था तो वह दृश्य और उस लम्बे कलाकार की धुंधली सी छवि जिसने रावण का किरदार निभाया। इस साल की शुरूआत में मैंने किसी टीवी चैनल पर एक फिल्म देखी, संपूर्ण रामायण (१९६१) और वही लम्बे कद के तीखे नैन-नक़्श वाले अभिनेता जिनकी रौबदार आवाज़, भावबोधक आँखें और सब से पृथक अभिनयशैली है, उसी दृश्य में मेरे सामने थे। वह थे वरिष्ठ अभिनेता, बी एम व्यास

बी एम व्यास दशानन रावन की भूमिका में

मैंने उनकी अभिनीत अन्य फिल्मों की तलाश की; उनके हर अभिनय के साथ उनका और काम देखने की मेरी इच्छा बढ़ती रही। ज्यादातर पौराणिक, ऐतिहासिक और काल्पनिक फिल्मों में खलपात्र निभानेवाले, वह अपनी-तरह-के-एकमात्र कलाकार हैं। कुछ महीने पहले मुझे पता चला कि ९१ वर्षीय व्यास जी मुंबई में रहते हैं। २२ सितम्बर को मैंने लेखक और फ़िल्म इतिहासकार शिशिर कृष्ण शर्मा जी की मदद से पहली बार उनसे से बात की। मुझे ऐसा लगा ही नहीं की मैं इस वरिष्ठ अभिनेता से पहली बार बात कर रही हूँ, वह इतने आत्मीय और मित्रवत हैं। २९ सितम्बर को मेरा स्वप्न साकार हुआ जब मैं उनसे मिलने उनके घर गयी। जिस सहजता से वह अपने से एक तिहाई उम्र के लोगों से भी तालमेल बिठा लेते हैं, उसे देख मुझे बड़ा अचरज हुआ। जो दो घंटे मैंने उनके साथ बिताए वह मेरी मधुर स्मृतियों में हमेशा रहेंगे। तब से मैं उनके संपर्क में हूँ। यह लेख उन यादों को समर्पित है जो उन्होंने मेरे साथ बाँटीं।

अब तक का सफ़र
बृजमोहन व्यास (बी एम व्यास) का जन्म विजयादशमी के दिन २२ अक्टूबर १९२० को चुरू, राजस्थान में हुआ। वह जाने-माने कवी और गीतकार भरत व्यास के छोटे भाई हैं। उनकी शादी १७ साल की उम्र में हुई, तब उनकी पत्नी, जमना केवल ११ साल की थीं। दोनों ने ७१ वर्षों तक आनंदमय वैवाहिक जीवन जिया। उनके ६ बेटियाँ और एक बेटा हैं। जमना जी का स्वर्गवास २००८ में हुआ। कई भाषाओँ में २०० से अधिक फिल्मों में अभिनय करने के बाद व्यास जी ने १९९० के दशक में अभिनय को अलविदा कहा। २ साल पहले वह अपने वर्तमान निवास्थान कल्याण में स्थायी हुए। ज़िन्दगी के कई रंग देख चुके व्यास जी आपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ एक संतुष्ट जीवन जी रहे हैं। उनका उत्साह उनकी आँखों की उस चमक में नज़र आता हैं जब वह निम्नलिखित पंक्तियाँ सुनते हैं जो उन्होंने एक प्रसिद्ध गाने पर आधारित कर लिखी हैं –

“ज़िन्दा हूँ इस तरह की, जिए जा रहा हूँ मैं
जलता हुआ दिया हूँ, टिमटिमा रहा हूँ मैं”

पृथ्वी थिएटर के पहले नाटक “शकुंतला” में
१५ जनवरी १९४४ को अभिनेता पृथ्वीराज कपूर को अपने सपने की अनुभूति हुई जब उनकी अपनी नाटक कंपनी पृथ्वी थिएटर का जन्म हुआ। महाकवि कालिदास की उत्कृष्ट रचना शकुंतला को पहले मंचन के लिए चुना गया। नाटक के कलाकारों में थीं उज़रा मुमताज़ (जोहरा सहगल की छोटी बहन) जो शकुंतला बनीं, पृथ्वीराज कपूर बने राजा दुष्यंत, के एन सिंह को शकुंतला के पोषक पिता, ऋषि कण्व का किरदार निभाने के लिए चुना गया, सती देवी (बिजया रे की बहन, रुमा गुहा ठाकुरता की माँ) कण्व आश्रम की अभिरक्षक तथा शकुंतला को पालपोस कर बड़ा करनेवाली माता गौतमी बनीं और शकुंतला की सहेली प्रियंवदा के किरदार के लिए हेमावती (दया किशन सप्रू की पत्नी) का चयन हुआ। नौजवान २४ वर्षीय बी एम व्यास जी को नाटकों में गीत गाने के लिए कंपनी में बतौर गायक ७५ रुपये की मासिक आय पर नियुक्त किया गया।

नाटक के रिहर्सल का पहला दौर जारी था और व्यास जी अपने गाने की रिहर्सल ख़त्म कर नाटक के कलाकारों की रिहर्सल देख रहे थे। इस नाटक में उनका एक गीत था “बिटिया रानी कहाँ कहाँ तपस्वी लोग, मिलना जुलना रह गया नदी नाव संजोग”। अभिनेता वर्ग उस दृश्य की रिहर्सल कर रहे थे जिसमें कण्व ऋषि को संस्कृत में एक मंत्र बोलना था, लेकिन अभिनेता के एन सिंह को यह मन्त्र बोलने में कुछ परेशानी हो रही थी। पृथ्वीराज जी उनकी मदद कर रहे थे परन्तु वह स्वयं भी सही उच्चारण नहीं कर पाए। व्यास जी जो हिंदी और संस्कृत के विद्वान और वेद-मन्त्रों के ज्ञाता हैं, यह सिलसिला दो दिनों से देख रहे थे। वह मानते हैं की माता सरस्वती ने ही उन्हें यह मंत्र जोर से बोलने के लिये प्रेरित किया होगा। मंत्र का इतना स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण सुनकर पृथ्वीराज जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने व्यास जी से के एन सिंह की मदद करने को कहा। लेकिन जल्दी ही के एन सिंह ने पृथ्वीराज जी से कहा कि वह देवभाषा नहीं बोल पाएंगे और उन्हें इस भूमिका के लिए किसी और कलाकार को लेना चाहिए। पृथ्वीराज जी ने पृथ्वी थिएटर के संचालक रमेश सहगल को अभिनय का प्रस्ताव लेकर व्यास जी के पास भेजा। व्यास जी जो पहले ही एक राजस्थानी नाटक रामू चणना में काम कर चुके थे, ख़ुशी-ख़ुशी मान गए, और इस रोल को स्वीकार करते हुए अभिनय क्षेत्र में अपना पहला कदम रखा।

इस नाटक की तैयारियाँ अभी भी चल रही थी कि व्यास जी को निजी कारणों से अपने घर बीकानेर, राजस्थान जाना पड़ा। वहीँ वह टाइफाइड से ग्रस्त हो गए। यहाँ नाटक की तैयारियाँ ज़ोरों-शोरों से चल रही थीं और नाटक का पहला प्रदर्शन ९ मार्च १९४५ को रॉयल ओपेरा हाउस में होना तय था। नाटक के मंचन में लगभग एक महीना बाकी था, इसलिए पृथ्वीराज जी ने व्यास जी से जल्द वापस आने को कहा। व्यास जी अपनी पत्नी के साथ लौटे मगर अभी भी वह पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे। जिस दिन वह रिहर्सल के लिए लौटे, चक्कर आने के कारण वह ज्यादा कुछ कर नहीं पाए। जो दवाई वह ले रहे थे उससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ। व्यास जी आज भी बहुत स्नेह से कालबादेवी के उस डॉक्टर को याद करते हैं जिन्होंने उनका मुफ्त इलाज़ किया और केवल तीन दिनों में उनकी तबियत में काफी सुधार आ गया।

रिहर्सल का अंतिम दौर ख़त्म हुआ और जल्दी ही वह दिन भी आ गया जब पृथ्वी थिएटर के पहले नाटक का पहला मंचन होना था। इस अवसर पर फिल्म जगत के कई जाने माने लोग रॉयल ओपेरा हाउस में उपस्थित थे। जिस अंक में कण्व ऋषि का मंच पर आगमन होता है, वह अपना हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हैं, मगर व्यास जी अभी भी कमज़ोर थे और उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने इस कंपन को नियंत्रित करने का बहुत प्रयास किया मगर कोई फायदा नहीं हो रहा था। फिर उन्हें याद आया कि कुछ वृद्ध लोगों के हाथ और सिर अनायास हिलते हैं इसलिए उन्होंने अपने हाथों के साथ-साथ अपने सिर को भी हिलाना शुरू किया। मंच पर इसका परिणाम इतना प्रभावी रहा की मध्यांतर में पृथ्वीराज जी ने आकर व्यास जी को गले से लगा लिया। जब उन्होंने इस अनोखे हाव-भाव के बारे में पूछा, व्यास जी ने उन्हें अपनी वास्तविक समस्या से अवगत कराया। पृथ्वीराज जी ने कहा कि उन्होंने बढ़िया काम किया है और इस नाटक के हर प्रयोग के दौरान उन्हें यह जारी रखना होगा।

बी एम व्यास विभिन्न भूमिकाओं में

व्यास जी पृथ्वी थिएटर के साथ १९४४ से १९५५ तक संलग्न रहे। इस दौरान उन्होंने अपने नाटक के सह-कलाकारों के साथ कई शहरों का दौरा किया। पृथ्वी थिएटर के विभिन्न नाटक जैसे दीवार, पठान, आहुति, गद्दार, कलाकार, आदि में उन्हें अपना गायन और अभिनय कौशल दिखाने के कई अवसर मिले। यह अभिनेता जिस समर्पण से अपने किरदारों को जीवंत करता होगा, वो आज भी नज़र आता है, जब वह अपने उन नाटकों के संवाद पूरे जोश से सुनते हैं जिनमें उन्होंने सालों पहले भाग लिया था।

गायन, एक अभिलाषा
व्यास जी को बचपन से ही संगीत में रूचि थी। वह स्व-शिक्षित गायक हैं। उनके घर में एक हारमोनियम था जिसे उन्होंने खुद ही बजाना सीखा। संगीत के जानकारों की संगत में रहना उन्हें पसंद था। वह गौर से सुनते और सीखते जाते। वह बड़े आदर से अपने गाँव के उस अंधे संगीतज्ञ को याद करते हैं जो बड़ी ख़ुशी से उन्हें अपने विविध वाद्ययंत्रों को बजाने कि अनुमति देते थे। उनका ऐसा कोई गुरु नहीं था जिनसे उन्होंने संगीत की शिक्षा ली हो परंतु वह कहते हैं की उन्होंने गायकी सिखाने की कला समझ ली थी। मुंबई आने से पहले वह बीकानेर में संगीत का प्रशिक्षण देते थे।

प्रतिभाशाली भाई: बी एम व्यास & भरत व्यास
(left pic) played Gopi & Shri Krishna respectively in a local play, Krishna-Sudama

१९४० के दशक के शुरूआती दौर में भरत व्यास जी ने अपने छोटे भाई को मुंबई बुलाया। जल्द ही उन्हें भरत जी के लिखे हुए राजस्थानी नाटक रामू चणना में मुख्य पात्र निभाने का और करीब २० गानों को स्वर देने का अवसर मिला। संगीतकार नौशाद साहब के सहायक गुलाम मुहम्मद जो राजस्थान से थे, नाटक में व्यास जी की आवाज़ को सुनकर उनसे बड़े प्रभावित हुए। वह उन्हें नौशाद साहब के पास ले गए जो फिल्म पहले आप (१९४४) के संगीत पर काम कर रहे थे। व्यास जी को इस फिल्म के एक समूह गीत, “हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा; हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा” में जाने-माने गायक जी एम दुर्रानी और श्याम कुमार सहित नवोदित-गायक मोहम्मद रफ़ी के साथ गाने का अवसर मिला। परदे पर यह गीत फौजी-सैनिकों द्वारा गाया जाना था; इसलिए व्यास जी और रफी साहब को भारी जूते पहनकर गीत गाते हुए फौजियों की लयबद्ध चाल से एक सैनिक-टुकड़ी के होने का प्रभाव बनाने को कहा गया। उस ज़माने में तकनीकी तौर पर ऐसा प्रभाव गाने की रिकॉर्डिंग के बाद शामिल करना संभव नहीं था इसलिए रिकॉर्डिंग के वक़्त ऐसा करना ज़रूरी था। हालाँकि व्यासजी का गया हुआ पहला गीत फिल्म भर्तृहरि (१९४४) से “अलख निरंजन, जय जय मनरंजन” था जिसे अरुण आहूजा (गोविंदा के पिता) पर फ़िल्माया गया था।

“हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा; हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”, पहले आप (१९४४) से; गायक: बी एम व्यास, मोहम्मद रफ़ी, जी एम दुर्रानी, श्याम कुमार

जब व्यास जी पृथ्वी थिएटर में बतौर गायक शामिल हुए, उन्हें अपने घर पर नियमित रियाज़ करना पड़ता था। एक संगीत शिक्षक अक्सर उन्हें रियाज़ करते सुना करते थे। एक बार उन्होंने व्यास जी से पूछा क्या वह संगीत सिखाने में रूचि रखते हैं। उस वक़्त उन्हें हर माह ७५ रूपये मिलते थे, इसे अतिरिक्त आय का अवसर जान कर व्यास जी ने हाँ कर दी। उस संगीत शिक्षक ने उन्हें जयचंद कपूर से मिलवाया और जल्द ही उन्होंने उनके बड़े बेटे बृजमोहन को संगीत की शिक्षा देना आरंभ किया। लेकिन बृजमोहन जी से ज्यादा उनके छोटे भाई को संगीत में रूचि थी और वह व्यास जी के शिष्य बने। यह नवयुवक और कोई नहीं हमारे प्रसिद्ध गायक महेंद्र कपूर थे, जिन्होंने हमेशा माना कि बी एम व्यास ही उनके पहले गुरु थे।

अभिनय की ओर रुख करने से पहले व्यास जी ने ४ फिल्मों में पार्श्व गायन किया – भर्तृहरि (१९४४, संगीतकार: खेमचंद प्रकाश), पहले आप (१९४४, संगीतकार: नौशाद), महाराणा प्रताप (१९४६, संगीतकार: राम गांगुली) और नौलखा हार (संगीतकार: आर सी बोराल)। व्यास जी को उस समूह गीत के कई वर्षों बाद रफ़ी साहब से हुई वह मुलाकात याद है जब उन्होंने बड़े प्यार से कहा था, “पंडित जी आपने तो हमारी लाइन (गायकी) छोड़ दी“. तब व्यास जी ने माना कि उन्हें गायकी में अपना भविष्य बनता दिखाई नहीं दिया और वह अभिनय की ओर मुड़ गए।

बी एम व्यास विभिन्न भूमिकाओं में

फिल्मी जीवन, एक सफ़र
पृथ्वी थिएटर के पहले नाटक शकुंतला के पहले मंचन के बाद, देविका रानी (बॉम्बे टॉकीज़ की मालकिन) यह जानने को उत्सुक थीं की कण्व ऋषि का किरदार किसने निभाया है। जब उन्होंने २४ वर्षीय व्यास जी को देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ; इतने वृद्ध व्यक्ति का पात्र निभानेवाला कलाकार इतना युवा हो सकता है उन्होंने सोचा नहीं था। उन्होंने व्यास जी से बॉम्बे टॉकीज़ की फिल्म में एक भूमिका की पेशकश की जिसका निर्देशन अभिनेता जयराज करनेवाले थे पर वह फिल्म कभी पूरी नहीं हुई।

पृथ्वी थिएटर छोड़ने के बाद रमेश सहगल बतौर प्रोडक्शन मैनेजर चेतन आनंद की कंपनी इंडिया पिक्चर्ज़ में शामिल हुए। जब कंपनी की नई फिल्म नीचा नगर (१९४६) पर काम चल रहा था, रमेश सहगल ने व्यास जी को इस फिल्म में नायक के बड़े भाई की छोटी सी भूमिका के लिए चुना। पृथ्वी थिएटर ने अपने अभिनेताओं पर कभी कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया। नाटकों में काम करने के साथ-साथ वह बाहर भी काम कर सकते थे। व्यास जी कैमरा का सामना करने को उत्सुक थे और उन्होंने इस भूमिका को खुशी से स्वीकार किया। इस फिल्म के क्रेडिट्स में उनका नाम ‘व्यास‘ दिया गया। फिर उन्हों ने राज कपूर की फिल्म आग (१९४८) में एक छोटी सी भूमिका निभाई, जिसमें उन्हें ‘बृजमोहन‘ के नाम से श्रेय दिया गया। मगर जिस भूमिका से उन्हें फिल्म-जगत में पहचान मिली वह थी अभिनेत्री नर्गिस के पिता की, फिल्म बरसात (१९४९) में। इस फिल्म में उन्हें ‘बी एम व्यास‘, नाम से श्रेय मिला। इस तरह व्यास जी के फिल्मी सफ़र की शुरुआत हुई जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

व्यास जी का करियर बेहद सफल और चार दशकों से भी ज़्यादा लंबे समय का रहा। वह हमेशा एक चरित्र अभिनेता रहे जिनके करियर की शुरुआत वृद्ध किरदारों से हुई थी। उनकी आख़िरी फिल्म शायद माँ (१९९१) थी।

दो आँखें बारह हाथ (१९५७)
व्यास जी फ़िल्मकार वी शांताराम के साथ काम करना चाहते थे इसलिए उन्होंने उनसे संपर्क किया। शांताराम जी अपनी अगली फिल्म दो आँखें बारह हाथ (१९५७) के ६ कैदियों के किरदारों के लिए अभिनेताओं का चयन कर रहे थे। व्यास जी ने उन्हें नहीं बताया कि वह इस फिल्म के गीतकार भरत जी के छोटे भाई हैं। शांताराम जी, शुरू-शुरू में उनके ऊँचे कद को लेकर दुविधा में थे, लेकिन जल्द ही उन्होंने व्यास जी को कैदी जलिया नाई के पात्र के लिए चुन लिया। इस फिल्म की शूटिंग कोल्हापुर में एक महीने तक चली। जब इस फिल्म की रील राजकमल स्टूडियो में धुलने के लिए आईं, तो पाया गया कि लैंस में कचरा आ जाने के कारण सारी फिल्म में लाइन ही लाइन नज़र आ रही हैं। एक महीने की सारी मेहनत व्यर्थ हो गई और उन्हें सब कुछ दोबारा शूट करना पड़ा। व्यास जी बताते हैं कि उनके लिए उस वक़्त अपनी तारीख़ें संभालना मुश्किल हो गया था क्योंकि इस फिल्म के साथ-साथ वह और भी फिल्मों में काम कर रहे थे। मेरी दृष्टि में इस फ़िल्म का सबसे यादगार दृश्य वह है जब जलिया नाई, जेलर (जो पात्र शांताराम जी ने स्वयं निभाया) को मारने के इरादे से उनके पास जाता है। व्यास जी कितने श्रेष्ट कलाकार हैं, यह इस दृश्य में साफ़ नज़र आता है। उनके शारीरिक हावभाव, चेहरे के भाव, आँखों और आवाज़ का बेहतरीन उपयोग और अभिनय का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

संपूर्ण रामायण (१९६१)
संपूर्ण रामायण (१९६१) के उस अविस्मरणीय दृश्य की चर्चा किए बिना मेरी व्यास जी से यह मुलाकात अधूरी रह जाती जिसके कारण शायद मैं वहां उनके समक्ष थी। व्यास जी ने कहा कि जब उन्हें रावण की भूमिका करने का प्रस्ताव मिला तो वह बहुत रोमांचित हुए। संस्कृत का शास्त्री होने के कारण उन्होंने इस पात्र के बारे में विस्तार में पढ़ा था। इसलिए वह इस पात्र को निभाने को बहुत उत्सुक थे लेकिन मज़बूत शारीरिक गठन वाले रावण की अपेक्षा वह काफी दुबले-पतले थे। इस बाधा को दूर करने के लिए उन्होंने रूई की पैडिंग वाले कपड़े पहने। स्टूडियो की गरमी में बड़ी-बड़ी लाइट्स से बढ़ते ताप के कारण वह उन रूई की पैडिंग वाले कपड़ो में पसीने से तरबतर हो जाते थे, लेकिन इस सब का असर उन्होंने अपने काम पर नहीं पड़ने दिया। वह अविस्मरणीय दृश्य जिसमें दशानन रावण अपने ९ सिरों से बातचीत करता है, होमी वाडिया और बाबूभाई मिस्त्री की अनोखी सोच का नतीजा था। इस दृश्य का फिल्मांकन १५ दिनों में हुआ था; व्यास जी को रोज़ उसी निर्धारित स्थान से एक स्थिर कैमरे से शूट किया जाता था, इसका अंतिम परिणाम बड़े परदे पर बहुत प्रभाशाली रहा।

सबसे यादगार लम्हा, शोखियाँ (१९५१)
व्यास जी से जब उनके पूरे करियर के सबसे यादगार और संतोषजनक लम्हे के बारे में पूछा गया तो उन्होंने हमें यह किस्सा सुनाया। पृथ्वी थिएटर के नाटक गद्दार में व्यास जी ने मौलाना की भूमिका निभाई थी। एक बार फिल्मकार केदार शर्मा यह नाटक देखने आए और व्यास जी की उर्दू में संवाद शैली से बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने व्यास जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की। शर्मा जी अपनी अगली फिल्म शोखियाँ (१९५१) पर काम कर रहे थे और एक ऐसे अभिनेता की तलाश में थे जो उसमें बाबा घनी की भूमिका निभा सके। उन्होंने व्यास जी को उर्दू में लिखा एक लम्बा संवाद दिया जो बाबा घनी युद्ध-भूमि से भागते हुए सैनिकों को प्रेरित करने के लिए बोलते हैं। व्यास जी ने बताया कि वह उर्दू पढ़ नहीं सकते, ये सुनकर शर्मा जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने व्यास जी से पूछा कि फिर उन्होंने मौलाना की भूमिका के लिए उर्दू में संवाद कैसे बोले। व्यास जी ने कहा उन्होंने सारे संवाद हिंदी (देवनागरी) में लिखवाकर उस किरदार की तैयारी की। उन्होंने शर्मा जी से कहा कि यदि वह उन्हें यह संवाद हिंदी (देवनागरी) में लिखवाकर दें तो वह उसे याद कर अगले ही दिन सुना सकते हैं।

अगले दिन उन्होंने वह संवाद पूरे भाव के साथ सुनाये, शर्मा जी ने उनकी सराहना करते हुए उन्हें चांदी का एक छोटा सा सिक्का दिया। इसके बाद शर्मा जी अक्सर मेहमानों के सामने उन्हें वह संवाद सुनाने को कहते। एक बार अभिनेता दिलीप कुमार शर्मा जी से मिलने आए तो व्यास जी को उन्हें भी वह संवाद सुनाना पड़ा । संवाद सुनकर दिलीप साहब बड़े प्रभावित हुए और उन्हें ऐसा लगा कि उन्होंने यह आवाज़ पहले सुनी है। व्यास जी ने उनसे कहा कि शायद उन्होंने राज कपूर की फिल्म बरसात (१९४९) देखी होगी जिसमें वह अभिनेत्री नर्गिस के पिता बने थे। दिलीप साहब ने व्यास जी को फिल्म बाग़ी (१९५३) में अभिनेत्री नसीम के पिता की भूमिका के लिए चुनने का सुझाव फिल्म के निर्माता और अपने भाई अय्यूब खान को दिया। भाग्यवश शोखियाँ (१९५१) की प्रतियां आज बाज़ार में उपलब्ध हैं और यह दृश्य आप सब भी देख सकते हैं। बहुत ख़ुशी होती हैं जब व्यास जी आज भी, लगभग ६० साल बाद, वह संवाद उसी भाव के साथ सुनाते हैं।

Listen in Vyas ji current voice

हिम्मत सिंह चौहान
व्यास जी अपनी-तरह-के-एक-ही अभिनेता हैं। नाटकों से प्रभावित उनका अभिनय, उनके शरीर और चेहरे की भावभंगिमा, उनका व्यक्तित्व, सब से पृथक था। लेकिन फिल्म हरी दर्शन (१९७२) में एक अभिनेता की ओर मेरा ध्यान गया जो मुझे व्यास जी की अभिनय शैली से बहुत प्रभावित लगे। मैं यह जानने को उत्सुक थी कि व्यास जी उन्हें जानते हैं या नहीं। उस कलाकार की तस्वीर मैं अपने साथ लेकर गयी थी। व्यास जी ने उस अभिनेता को हिम्मत सिंह चौहान के नाम से पहचाना और बताया कि वह नर्तक थे गुजरात से और परदे पर उनके भाई बना करते थे। एक पौराणिक फिल्म में व्यास जी हिरण्यकश्यप की भूमिका में थे और छोटे भाई हिरण्याक्ष की भूमिका के लिए अभिनेता की तलाश जारी थी। एक दिन निर्माताओं ने व्यास जी से कहा कि उन्हें बिलकुल उन-जैसा एक अभिनेता मिला गया है जो परदे पर उनका छोटा भाई बनने के लिए पूर्णतः उपयुक्त है और उनका परिचय हिम्मत सिंह जी से कराया। व्यास जी कहते हैं कि उस अभिनेता ने उनकी शैली का बखूबी अनुसरण किया। दोनों ने कुछ फिल्मों में साथ काम किया था।

व्यास जी जैसे व्यक्तित्व से मिलने से, जिन्होंने कई दौर बदलते, आते और जाते देखे, एक परिपूर्णता का अनुभव होता है। उनके साथ बातचीत में नाटको/फिल्मों के संवाद/गीत जो उन्होंने कई दशक पहले बोले/गाए, उनकी अथवा उनके भाई भरत जी द्वारा रचित कविताओं की पंक्तियाँ, अर्थ सहित संस्कृत के मन्त्रों, आदि का समावेश होता है। वह आँखें जिन्होंने आज़ादी के लिए संघर्ष से भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे संघर्ष तक, मूक से बोलती फिल्मों तक, श्वेत-श्याम से रंगीन फिल्मों तक, पृथ्वीराज कपूर से लेकर उनके पड़पोते रणबीर कपूर तक का बदतला वक़्त देखा है; चमक उठती हैं जब वह कोई वृत्तांत सुनते हैं।

बी एम व्यास जी से, एक व्यक्ति, एक निपुण कलाकार, एक आइकन के रूप में मैंने जो भी पाया, वह सब इस लेख में समेटने की कोशिश की हैं। हम आशा करते हैं कि आने वाले कई वर्षों तक वह हमें अपना ज्ञान और आशीर्वाद देते रहेंगे।

– मैत्री मंथन

* We would like to thank writer Shishir Krishna Sharma, Sanjeev Deshpande, Pranay Vyas and Urvish Kothari for their assistance.

* The information provided in this blog is to the best of our knowledge, if any discrepancies are found please let us know. Thank you.

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21 responses to “B M VYAS

  1. Very well researched and a well written write up…amazing indeed…thanks to Maitri Manthan for such a precious Diwali gift to OHF lovers…!!!

  2. Maitrij:

    Congratulations! Wow!! Thanks!!!

    Words can’t describe how I felt when I read your published blog on Vyasji. Although I had read the earlier drafts, there is no comparison whatsoever between those and the final version. The sound & video clips & photos make it all come to LIFE. The whole package is a perfect tribute to Vyasji. Hope he liked the Hindi translation. We can all be proud and thankful of him for all he has accomplished.

    I hope you realize the tremendous contributions you are making to the history of Indian Cinema. I am truly grateful to both of you for your tireless efforts in producing such perfect and permanent tributes! And, fittingly, during India’s most auspicious festival days of the Diwali Holidays. You are indeed blessed with the gift of curiosity & inquiry, & the eventual sharing of what you discover with everyone who cares to read about the past. Bravo!

    Shashi Kapoor

  3. Very well done and researched post on such an appreciable multi – faceted aritste. Thanks a lot. Earlier I didn’t know that he sang the Alakh Niranjan song (which is unavailable) in the blockbuster Bhartari (1944) – thanks for the information! Please tell me your source if possible. Congrats once more.

  4. Maitri,

    My father, Sunder Lal Vyas, 75, is a great fan and admirer of Sh. B.M. Vyas, I gave him print out and told him about your work done on Vyas ji, He has seen almost all of his films, he even met him at his house along with my brother, I also got an opportunity to met him, Vyas ji gave me his rare pictures and list of films to give it to my father. My father is a great fan of him and I thank you and congratulate you on your work.

    thanks & with best regards.
    Bharat Bhushan Vyas

  5. Since childhood me and my brother are also fan of B M Vyas.It was a pleasant surprize to know there are detailed articles on both brothers.

  6. Lovely, lovely article. He is in every fantasy film from the late 50s and 60s…what a varied and wonderful career. May he rest in peace, and thank you for this Maitri.

  7. So sad to hear from Maitri Manthan in an email yesterday that Vyasji’s journey has come to an end. Let us celebrate his outstanding career. And thanks to this blog, many more fans will know about him. Peace!

  8. RIP Shri Vyasji.

    thanks for this lovely article.

    Can u please list which are the songs he sung for : Maharana Pratap (1946, MD: Ram Ganguli) and Naulakha Haar (MD: R C Boral) ?

    Thanks and Regards.

  9. I have been going through your blog, there is a lot of matter, it brings back lots of memories, for instance in this post about BM Vyas you have mentioned about Sati Devi, I remember my mother used to talk a lot about her. You are really doing a great service, thanks to such blogs such important people of the film industry will never be forgotten.— Shilpi Bose

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