ANTIM AATH DIN

पिछले वर्ष मराठी भाषा में “अखेरचे आठ दिवस” अर्थात “अंतिम आठ दिन” नामक एक कहानी पढ़ी | भारत के महाराष्ट्र प्रदेश में संत एकनाथ नामक एक तपस्वी महात्मा हुए हैं | यह कथा उन्हीकी जीवनी से ली गयी है | आज हम उसी कथा का हिंदी भाषांतर प्रस्तुत कर रहे हैं |

अंतिम आठ दिन

एक बार संत एकनाथजी को एक गृहस्थने दो प्रश्न पूछे | पहला प्रश्न उसने स्वयं के भविष्य के बारेमें पूछा अरु दूसरा एकनाथजी के सहज ही शांत स्वाभाव के बारे में | एकनाथजी सदा हर परिस्थिति में शांत कैसे रहते हैं, इसका भेद जानना चाहते थे |

एकनाथजी ने हंसकर कहा “फिर कभी बताऊँगा” |

कुछ दिनों बाद एकनाथजी उस गृहस्थ से फिर मिले और कहा – “तुम्हारे पहले प्रश्न का उत्तर देने का समय आ गया है, कारण, दुर्भाग्य से आठ दिन बाद तुम्हारी मृत्यु होगी” | इतना कहकर एकनाथजी वहां से चले गए |

यह सुनकर वह गृहस्थ स्तब्ध से रह गए, फिर दुखी मन से घर लौट गए | “यदि इतना ही जीवन शेष है तो एकनाथजी जैसे संत के सदाचरण का अनुसरण करूंगा”, ऐसी विचार उनके मन में जागा | उन्होंने इस विचार को सार्थक किया और जीवन के आठ दिन पूर्ण करके, नौवे दिन वे एकनाथजी का दर्शन करने गए |

एकनाथजी के सन्मुख हाथ जोड़कर बोले – “आपकी कृपा से बच गया महाराज” |

एकनाथजी ने उनसे पूछा – “बीते आठ दिनों में तुम्हारा आचरण कैसा रहा? कितनी बार क्रोध किया?”

वे गृहस्त बोले – “कैसा क्रोध महाराज? मेरे पिछले आठ दिन बड़ी शांति से गुज़ारे | यद्यपि मरने के भय के कारण बेचैन रहा पर दूसरों पर क्रोध करने से जो बेचैनी होती है वह नहीं थी | पत्नी से कोई झगड़ा नहीं | बच्चों को मारा नहीं | सोचा ‘अब तो आखरी आठ दिन बचे हैं, इसके बाद पत्नी और बच्चे नहीं दिखने वाले, क्यों व्यर्थ ही उन्हें दुखाऊँ’ | और तो और ज़मीन को लेकर पड़ोसियों से पिछले चार पीड़ियों से बैर था | उन्हें भी बुलाकर उनकी इच्छानुसार जो भाग चाहिए था वह दे दिया | जिनको पैसे उधार दिए थे , उनमें हो गरीब हैं, उनके पैसे छोड़ दिए | कुछ पैसे खोये पर बहुत शांति पाई | इस दृष्टी से देखें तो बहुत शांति से पिछले आठ दिन बीते |

एकनाथजी ने उन गृहस्त के पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा – “यही तुम्हारे दुसरे प्रश्न का उत्तर है | आठ दिनों बाद यह जग छोड़के जाना है, इसी विचार के साथ मैं सदा आचरण करता हूँ | इसलिए सदा शांत लगता हूँ” |

जिस सरलता से संत एकनाथ महाराज ने यह महान शिक्षा दी मुझे बहुत अच्छी लगी | आज जब उत्तेजित होने में हमें एक क्षण भी नहीं लगता, इस शिक्षा की हमें कितनी आवश्यकता है | इस शिक्षा का अनुसरण कर सकें तो जीवन के आधे ताप-संताप मिट जाएँ परन्तु यह इतना सरल भी नहीं है | हमें स्वयं से आशा है की किसी दिन हम भी इस शिक्षा का पूर्ण अनुसरण कर सकेंगे |

– मैत्री मंथन

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One response to “ANTIM AATH DIN

  1. A wonderful lesson for all of us to emulate.

    We are impatient and hence lose the Peace of mind and are always wanting to give Piece of our mind to others. Mother Nature teaches us a very important lesson that of “Patience”. Let us imbibe this nature of being patient with everyone and everything around us, then we will enjoy the real beauty of this world.

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